देश भर में चहुँओर उभर रहे आक्रोश के झंझावातों के बीच भागवत जी की एक कथा अनसुनी सी ही रह गयी। अब जब सुनी ही नहीं गयी तो जाहिर है कि उसमें निहित अंदेशे और संदेशे भी उस हिसाब से नहीं समझे-बूझे गए जिसकी वे दरकार रखते हैं। पिछले महीने उज्जैन में ‘युवा धर्म संसद’ में, जिन्हे वे अपने कुल कुटुंब का जेन-जी मानते हैं ऐसे, करीब 1,700 ‘युवाओं को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सुप्रीमो मोहन भागवत ने कहा कि आधुनिक ‘धर्मनिरपेक्षता’ एक पश्चिमी अवधारणा है, जो भारत के लिए उपयुक्त नहीं है।
वे यहीं तक नहीं रुके, अपने इस प्रबोधन में उन्होंने यह भी दावा ठोक दिया कि भारत की धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा धर्मों के बीच भेदभाव नहीं करने की उसकी ऐतिहासिक परंपरा में निहित है। इसी रौ में उन्होंने धर्म को भी नयी तरह से व्याख्यायित करते हुए स्थापना दी कि ‘धर्म’ के बारे में भारत की समझ पश्चिमी देशों की धर्म की धारणा से मौलिक रूप से भिन्न है, जो शासकों और धार्मिक सत्ताओं के बीच ऐतिहासिक संघर्षों से उपजी थी।‘
यह भी बताया कि हमारा धर्म धर्म है उनका धर्म रिलिजन है। इन दोनों में फर्क बताते हुए उन्होंने यह भी जोड़ा कि जहां पंथ (रिलिजन) बांधता है, वहीं ‘धर्म’ मुक्त करता है और ‘मोक्ष’ की ओर ले जाता है।‘ यह सूचना भी दी कि ‘हमारा देश हमेशा आपस में घुलमिल कर रहा है। यह अपने लोगों के बीच भेदभाव नहीं करता है। भारत की धर्म के प्रति ऐतिहासिक निष्ठा का उल्लेख किया और युवाओं से आग्रह किया कि वे अपनी पूजा-अर्चना की पसंद का सम्मान करें और दूसरों की प्रथाओं का भी आदर करें। हमारे लिए पंथ निरपेक्षता का यही अर्थ है।’
भागवत कथा का यह अध्याय पहली ही नजर में भारत के संविधान का नकार और धिक्कार है। देश का संविधान न सिर्फ भारत को एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य घोषित करता है बल्कि बाकायदा धर्मनिरपेक्षता को परिभाषित भी करता है। संविधान के अनुच्छेद 25 से 28 देश के सभी नागरिकों को किसी भी धर्म को मानने, उसका आचरण करने और प्रचार करने की पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान करते हैं। अनुच्छेद 14, 15, 16 इस बात की गारंटी करते हैं कि राज्य धर्म के आधार पर किसी भी नागरिक के साथ कोई भेदभाव नहीं करेगा और कानून के समक्ष सभी को समान अवसर व संरक्षण प्राप्त होगा।
संविधान और धर्मनिरपेक्षता के नाभि-नाल संबंध को भारत का सर्वोच्च न्यायालय एकाधिक बार स्पष्ट कर चुका है। यहाँ तक कह चुका है कि देश का धर्मनिरपेक्ष रूप ऐसी स्थिति है जो संविधान की बुनियाद का हिस्सा है और इसे बदला नहीं जा सकता। 1994 में एसआर बोम्मई मामले में सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने साफ़-साफ़ शब्दों में स्पष्ट किया था कि धर्मनिरपेक्षता भारतीय संविधान के मूल ढांचे का एक अहम हिस्सा है, जिसे संसद भी नहीं बदल सकती।
धर्मनिरपेक्षता को भारतीय संविधान की मूल विशेषता घोषित करते हुए कोर्ट ने यह भी कहा है कि धर्मनिरपेक्षता मौलिक कानून का हिस्सा है और देश की राजनीतिक व्यवस्था के मूल ढांचे का एक अभिन्न अंग है। भारतीय संविधान ने अपनी प्रस्तावना, मौलिक अधिकारों और नीति-निर्देशक सिद्धांतों के माध्यम से समानता और भेदभाव-रहित सिद्धांत पर आधारित एक धर्मनिरपेक्ष राज्य का निर्माण किया है। सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र की भारतीय संवैधानिक विचारधारा के विकास के साथ, धर्मनिरपेक्षता को भारतीय संविधान का ‘मूल ढांचा’ माना और कहा कि इसमें बदलाव करने की शक्ति संसद के पास भी नहीं है। इस तरह का कोई संविधान संशोधन भी नहीं लाया जा सकता।
भागवत जी हाशिये के व्यक्ति नहीं हैं, वे उस पार्टी के निर्देशक और निर्माता संगठन के मुखिया है जो इस समय देश की सत्ता पर काबिज है। उनके द्वारा धर्मनिरपेक्षता को पुनर्परिभाषित करने और एक तरह से उसे अभारतीय बताने की कोशिश की आसानी से अनदेखी नहीं की जा सकती। इसे इन कुनबे की संसदीय लोकतंत्र, संविधान के खिलाफ जारी उस मुहिम के एक चरण के रूप में देखा जाना चाहिए जो इन दिनों तेजी से तेज से तेजतर होती जा रही है। इसलिए यह एक आपत्तिजनक और खतरनाक वक्तव्य है।
सरकार का यह जिम्मा बनता है कि उसे इस तरह के संविधान विरोधी कथनों की निंदा और भर्त्सना करनी चाहिए। मगर ऐसा होने वाला नहीं है। क्यों? इसे दोहराने की आवश्यकता नहीं है। यहाँ भागवत जी की कथनी की असलियत उन्हीं के किये-धरे के आधार पर जांचने की जरूरत है।
जब वे “अपनी परंपराओं के प्रति प्रतिबद्ध रहते हुए पूजा के अन्य रूपों का सम्मान करने” और “भारत की परंपरा लोगों को विभाजित करने के बजाय उन्हें एकजुट करने की” होने की याद दिला रहे थे – सर्व धर्म समभाव की दुहाई दे रहे थे तब हर मस्जिद के नीचे शिवलिंग की तलाश इतनी तेजी से हो रही थी कि स्वयं भागवत जी को – भले दिखावे के लिए ही सही – खुद कहना पड़ा था कि यह अब बंद किया जाना चाहिए। हालांकि इसके बाद भी इस पर विराम नहीं लगा।
इसमें कोई ख़ास अचरज की बात नहीं है – गली मे क़त्ल करके चौराहे पर रोना, संघ की आजमाई हुई अदा है। उनका हुड़दंगी कुनबा ही नहीं उनके नियंत्रण वाली सरकारें भी पांच-पांच सौ साल पुरानी मस्जिदें, दरगाह और मजारों को जेसीबी और बुलडोज़र ढहाने में लगी थीं। चीन्ह-चीन्हकर मुस्लिम धर्मस्थल तोड़े जा रहे थे।
वाराणसी, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, बिहार सहित में सड़क चौड़ीकरण और अवैध कब्जों को हटाने के अभियानों के तहत दर्जनों मुस्लिम धार्मिक स्थलों – मस्जिदों, मजारों और मदरसों – को हटाए जाने या तोड़े जाने की खबरें सामने आ रही थीं। स्वाभाविक है कि भागवत जी के ‘सर्व धर्म समभाव’ की कथनी पर अमल में हुई ऐसी कार्रवाइयों का कोई आधिकारिक या एकमुश्त केंद्रीय आंकड़ा सरकार द्वारा जारी नहीं किया गया है। अलग-अलग मीडिया रिपोर्ट्स व स्थानीय दावों के अनुसार अलग-अलग संख्या बताई जाती है।
मगर अनुमान लगाने के लिए जून 2026 की रिपोर्ट्स में पिछले 45 दिनों में 20 से अधिक और जुलाई 2026 में वाराणसी की दालमंडी में 5 मस्जिदों को हटाए जाने की बात सामने आई। उत्तर प्रदेश के सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में बनी कलेक्ट्रेट से भी ज्यादा पुरानी मस्जिद को 5 सितंबर 2026 की तड़के प्रशासन ने भारी पुलिस बल और आरएएफ की सुरक्षा के बीच बुलडोजर से ध्वस्त कर दिया। इस मस्जिद को लेकर भागवत जी के संघ के बजरंग दल के पूर्व प्रांतीय संयोजक विकास त्यागी ने शिकायत दर्ज कराई थी कि यह सरकारी जमीन पर अवैध रूप से निर्मित है।
जिसके बाद, जुलाई 2026 में सिटी मजिस्ट्रेट ने 315 वर्ग मीटर की इस संरचना को सरकारी भूमि पर अवैध कब्जा घोषित कर दिया और 6 करोड़ 41 लाख रूपये का जुर्माना अलग से ठोक दिया।
धर्मनिरपेक्षता की कुनबे की नयी परिभाषा और संघ प्रमुख का ‘धर्म’ को एक ऐसा सिद्धांत बताने का दावा जो उज्जैन में बोले गये उनके शब्दों में ‘ब्रह्मांड को धारण करता है, सभी की प्रगति को बढ़ावा देता है और प्रत्येक जीव तथा वस्तु की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए कर्तव्य का निर्धारण करता है।‘ कितना सच्चा था यह दिल्ली के एक पुलिस थाने में नाम की वजह से निर्ममता के साथ पीटी और अपमानित की गयी दो स्त्री पत्रकारों ने ठीक उसी दौरान भुगत कर देखा जब यह प्रवचन सुनाया जा रहा था। इन दोनों युवा पत्रकारों के अनुसार उन्हें उनके मुस्लिम नाम की वजह से पिटाई का शिकार बनाया गया।
कपड़े पहचान कर मुजरिम पहचान लेने की विधा में सिद्ध संघ स्वयंसेवक के प्रधानमंत्री बनने के बाद से एक सर्वे के मुताबिक शुरूआती तीन वर्षों में ही मॉब लिंचिंग की घटनाओं में से 97 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई। मॉब लिंचिंग की 63 घटनाओं में से 32 घटनाएं गायों से संबंधित थीं, और ज्यादातर मामलों में राज्य के अंदर बीजेपी सत्ता में थी। वर्ष 2014 से 2026 के बीच हुई मॉब लिंचिंग की घटनाओं का कोई एकजाई आधिकारिक सरकारी आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, क्योंकि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो इसे एक अलग अपराध श्रेणी के रूप में दर्ज नहीं करता है।
हालांकि, स्वतंत्र समूहों, नागरिक अधिकार समूहों और हालिया रिपोर्ट्स कुछ झलक देते हैं। दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. जफरुल-इस्लाम खान द्वारा जारी 744 पृष्ठों की विस्तृत शोध रिपोर्ट मई 2014 से मई 2024 के बीच 1,743 मॉब लिंचिंग और निशाना बनाकर की गयी हिंसा की घटनाओं का ब्यौरा सामने लाती है। इन आंकड़ों में गौ-गुंडों के कारण 53 घटनाएं, धार्मिक पहचान के कारण 89 घटनाएं, तथा सड़क पर हुए हिंसक झगड़ों और विवादों के कारण भीड़ की हिंसा में तब्दील हुई 571 घटनाएं शामिल हैं।
सीमित दायरे वाले अन्य स्वतंत्र आंकड़ों के अनुसार, एक तय अवधि में केवल सांप्रदायिक या जातिगत आधार पर लक्षित मॉब लिंचिंग के मामलों की संख्या खतरनाक तेजी से बढ़ी है। एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, 2014 से 2023 के बीच कुल ‘भीड़ द्वारा हिंसा’ के मामलों की संख्या 5,26,000 से अधिक दर्ज की गई । अध्ययन बताते हैं कि इन सबमे सजा सुनाये जाने की दर चिंताजनक स्तर तक कम रही। जो पकड़े भी गए तो जमानत पर या बरी होने पर छूटने पर उनका स्वागत करने वाले कौन थे यह बात कमसेकम संघ प्रमुख तो जानते ही होंगे।
यह एक सुनियोजित सिलसिले का हिस्सा है इसकी ताजा मिसाल ज्ञानेश कुमार को नियुक्ति के साथ ही अभयदान देकर उसके जरिये कराई गयी 13 करोड़ मतदाताओं की छंटाई ने दुनिया के सामने ला दिया है। देश भर की मतदाता सूचियों पर चलाये गए एसआईआर मत-संहार में किन्हें छांट छांट कर बाहर किया गया है इसकी जानकारियाँ हर रोज उजागर हो रही हैं। इसमें फॉर्म 7 के जरिये मुस्लिम मतदाताओं के नाम हटाने के लिए की गयी शिकायतों के तरीके और पैटर्न इसके पीछे संघ के तंत्र की सुनियोजित लिप्तता के जीतेजागते प्रमाण हैं।
भारतीय लोकतंत्र और संविधान के साथ यह दुष्टता एकतरफा तरीके से चलती रहे इसके लिए सूची मे जोड़ने घटाने के सर्वाधिकार दिल्ली के निर्वाचन सदन में केन्द्रित किये जाने के पीछे कौन है यह भी अब ज्यादातर हिन्दुस्तानियों की समझ में आ गया है। यहाँ सिर्फ़ मुसलमानों पर बरस रही किरपा की झलक बताई जा रही है। इस तरह की किरपा के मामले में भागवत जी का कुनबा समभावी है – सनातनियों को छोड़ बाकी सभी धर्मों और पंथों पर बराबरी से मेहरबान है।
उज्जैन में संघ प्रमुख का सर्व धर्म समभाव जाप असल में उसकी आड़ में इन सारे कारनामों को छुपाने और भारत की जान और प्राणवायु धर्मनिरपेक्षता को हटाने की दिशा में तेज की जाने वाली आपराधिक मुहिम का इशारा है।
हालांकि इसी भाषण में मानवीय दंभ के प्रति चेतावनी देते हुए भागवत ने कहा था कि “एक व्यक्ति का अहंकार अक्सर पूर्ण नियंत्रण का एक मिथ्या भ्रम पैदा करता है। मनुष्य अपने अहंकार में रहता है कि सब कुछ उसके अपने अधिकार से चलता है। और उसके कारण, वह यह गलत धारणा रखता है कि ऐसी चीजें भी उसकी इच्छा के अनुसार चलनी चाहिए और करनी चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं है।“
चूंकि यह संबोधन नॉनबायोलॉजिकल स्वयंसेवक प्रधानमंत्री के जन्मदिन के अगले ही दिन दिया गया था इसलिए इसे नरेंद्र मोदी पर किये गए व्यंग, दिए गए सन्देश के रूप में देखा गया। मगर असल में यह खुद उन पर लागू होता है। यह याद दिलाता है कि जिस अहंकारी दंभ के साथ वे और उनका कुनबा भारत के कई हजार साल के हासिल को रौंदने निकले हैं उसे देश की जनता क़ुबूल नहीं करेगी। प्रतिकार होगा, प्रतिरोध भी होगा।
इन दिनों सडकों पर वही सब दिखाई दे रहा है। जिसका आगे आने वाले दिनों में और आगे जाना तय है। अब अगर भागवत जी को लगता है कि उनके इस तरह के संबोधन प्रबोधनों के तिनकों से ये दरिया जो झूम के उट्ठे हैं वे टाले जा सकेंगे तो यह उनका मुगालता है। जेन-जी का उभार, मध्यम वर्गियों में उठता रोष का ज्वार और मेहनतकशों के संघर्षों की झंकार झांसे के राजा की झांसेबाजी का बाजा बजाने के लिए दृढ संकल्पित दिख रहे हैं।
(बादल सरोज लोकजतन के संपादक हैं और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं।)